उत्तरकाशी। उत्तराखंड के राजकीय विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर तस्वीर सामने आई है। प्रदेश के राजकीय इंटर कॉलेजों में प्रधानाचार्यों के करीब 90 प्रतिशत पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। वहीं, हाईस्कूलों में भी प्रधानाध्यापकों के अधिकांश पद खाली हैं। विद्यालयों में नेतृत्व और प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों की कमी का सीधा असर पढ़ाई और स्कूलों की व्यवस्थाओं पर पड़ रहा है। शिक्षकों की पदोन्नति प्रक्रिया लंबे समय से ठप होने के कारण शिक्षकों में भी नाराजगी बढ़ती जा रही है।
हर दिशा से जुड़ रहा "उत्तराखण्ड"
शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों का मानना है कि राजकीय विद्यालयों में छात्रसंख्या घटने के पीछे कई कारण हैं। इनमें प्रधानाध्यापकों और प्रधानाचार्यों के रिक्त पदों के साथ-साथ शिक्षकों से गैर शैक्षणिक कार्य कराना भी एक प्रमुख वजह है। जब विद्यालयों में स्थायी प्रधानाचार्य और प्रधानाध्यापक नहीं हैं तो शिक्षकों को पढ़ाई के साथ-साथ प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ रही हैं। इससे विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
इंटर कॉलेजों में प्रधानाचार्यों के 1385 पद, 90 प्रतिशत रिक्त
प्रदेश के राजकीय इंटर कॉलेजों में प्रधानाचार्यों के कुल 1385 पद स्वीकृत हैं। इनमें से करीब 90 प्रतिशत पद वर्षों से खाली पड़े हैं। इस स्थिति से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकारी विद्यालयों में प्रशासनिक व्यवस्था किस तरह प्रभावित हो रही है। इसके अलावा हाईस्कूलों में भी प्रधानाध्यापकों के अधिकांश पद रिक्त होने से विद्यालयों का संचालन प्रभावित हो रहा है।
स्वरोजगार एवं उद्यमिता योजनाएँ
प्रधानाचार्य किसी भी विद्यालय की शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमुख होता है। ऐसे में लंबे समय तक इन पदों पर नियुक्तियां और पदोन्नतियां नहीं होने से विद्यालयों में निर्णय लेने से लेकर अनुशासन और शैक्षणिक गतिविधियों के संचालन तक कई तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं।
35 से 36 साल सेवा के बाद भी बिना पदोन्नति हो रहे शिक्षक सेवानिवृत्त
राजकीय शिक्षक संघ के पूर्व जिलाध्यक्ष अतोल सिंह महर ने पदोन्नति प्रक्रिया लंबे समय से बंद होने पर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि प्रधानाध्यापक और प्रधानाचार्य के अधिकांश पद पदोन्नति के माध्यम से भरे जाने हैं, लेकिन लंबे समय से विभाग में पदोन्नति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
उन्होंने बताया कि प्रदेश में कई शिक्षक ऐसे हैं, जो 35 से 36 साल तक एक ही पद पर सेवाएं देने के बावजूद बिना पदोन्नति के सेवानिवृत्त हो रहे हैं। यह शिक्षकों के लिए निराशाजनक स्थिति है। लंबे समय तक सेवा देने के बाद भी उन्हें पदोन्नति का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
शिक्षकों पर बढ़ रहा अतिरिक्त प्रशासनिक कार्यों का बोझ
अतोल सिंह महर के अनुसार, विद्यालयों में स्थायी प्रधानाध्यापक और प्रधानाचार्य नहीं होने के कारण शिक्षकों को अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी संभालनी पड़ रही हैं। इसके लिए उन्हें अलग से कोई अतिरिक्त मानदेय भी नहीं दिया जा रहा है।
शिक्षकों को एक ओर अपने विषयों का पठन-पाठन कराना होता है, वहीं दूसरी ओर विद्यालय से जुड़े प्रशासनिक कामकाज की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है। ऐसे में उनका अधिक समय गैर शैक्षणिक कार्यों में खर्च हो रहा है। इसका सीधा असर कक्षाओं में पढ़ाई पर पड़ता है और विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पाती।
न्यायालय में मामले लंबित होने के बावजूद पहले होती रही पदोन्नति
पदोन्नति प्रक्रिया में देरी को लेकर न्यायालय में लंबित मामलों का भी हवाला दिया जाता रहा है। हालांकि, अतोल सिंह महर का कहना है कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच से जुड़े मामले न्यायालय में विचाराधीन होने के बावजूद वर्ष 2020-21 तक पदोन्नतियां होती रही हैं।
ऐसे में वर्ष 2021 के बाद से पदोन्नति प्रक्रिया पूरी तरह प्रभावित होने के लिए केवल न्यायालय में लंबित मामलों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। विभाग को इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए, ताकि वर्षों से पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे शिक्षकों को उनका अधिकार मिल सके।
सरकार और शिक्षा विभाग से पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करने की मांग
राजकीय शिक्षक संघ के पूर्व जिलाध्यक्ष ने प्रदेश सरकार और शिक्षा विभाग से जल्द पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करने की मांग की है। उनका कहना है कि प्रधानाध्यापकों और प्रधानाचार्यों के रिक्त पदों को भरना बेहद जरूरी है। इससे विद्यालयों की प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत होगी और शिक्षकों को अनावश्यक अतिरिक्त जिम्मेदारियों से राहत मिलेगी।
उन्होंने कहा कि यदि समय रहते पदोन्नति प्रक्रिया शुरू नहीं की गई तो इसका असर आने वाले समय में भी सरकारी विद्यालयों की शैक्षणिक गुणवत्ता पर पड़ सकता है।
सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए रिक्त पद भरना जरूरी
प्रदेश के राजकीय विद्यालयों में प्रधानाचार्यों और प्रधानाध्यापकों के रिक्त पदों का मामला केवल विभागीय पदोन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध विद्यार्थियों के भविष्य और सरकारी शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता से भी है। विद्यालयों में स्थायी नेतृत्व की कमी, शिक्षकों पर अतिरिक्त कार्यभार और लंबे समय से पदोन्नति नहीं होने जैसी समस्याएं शिक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती बनी हुई हैं।
ऐसे में अब शिक्षकों की मांग है कि सरकार और शिक्षा विभाग इस मामले को गंभीरता से लेते हुए पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करें और रिक्त पदों को जल्द भरने की दिशा में आवश्यक कदम उठाएं, ताकि राजकीय विद्यालयों में पढ़ाई और प्रशासनिक व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित हो सके।

