देहरादून: उत्तराखंड में लोकसभा की सभी पांचों सीटों के लिए 19 अप्रैल को होने वाले मतदान की घड़ी अब निकट है, लेकिन अभी तक चुनाव जैसा अहसास नहीं हुआ। पिछले चुनावों में जिस तरह का माहौल चुनाव प्रचार के दौरान दिखता था इस बार नदारद रही।
ऐसा नहीं कि माहभर के अभियान के दौरान चुनाव प्रचार नहीं हुआ, लेकिन स्वरूप कुछ अलग ही रहा। चुनाव मैदान में उतरे प्रत्याशियों के साथ ही स्टार प्रचारक सभाएं भी कर गए। वादों-दावों की पोटली भी खुली, लेकिन वातावरण शांत-शांत सा रहा। न चुनावी शोर गूंजा और न झंडे-डंडों को लेकर कहीं मारामारी दिखी।
मतदाताओं ने सबकी बात सुनी, लेकिन जुबां पर खामोशी ओढ़े रखी। मतदाता ने किसी को अपने मन की थाह नहीं लेने दी, जिसने राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के दिलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। साथ ही चुनावी पारा न चढऩे को लेकर तमाम कारण भी फिजां में तैर रहे हैं। पिछली बार तक जिस तरह से चुनावी पारा चढ़ता रहा है, वह गायब था। हर बार की तरह इस बार चुनाव क्यों नहीं उठा। क्यों चुनावी पारे ने उछाल नहीं भरी। यानी, स्वाभाविक रूप से हर किसी की जुबां पर यह विषय चर्चा के केंद्र में है। सूरज की तपिश के बीच वातावरण में चुनावी तापमान नहीं दिखा तो इसके पीछे राजनीतिक कारण भी समाहित हैं।
असल में भाजपा ने अपने चुनाव अभियान का आगाज काफी पहले से ही प्रारंभ कर एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक बढ़त ले ली थी। उसने इस बार चार सौ पार का नारा दिया। इसका जनता पर क्या असर पड़ा, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा, लेकिन कांग्रेस पर इसका असर अवश्य देखा गया। कांग्रेस में चुनाव लडऩे को लेकर चली ना-नुकुर को इससे जोड़कर देखा जा रहा है और इसने पार्टी कार्यकर्ताओं के उत्साह को कम करने का काम किया। बाद में प्रत्याशियों के मैदान में उतरने पर कांग्रेस कार्यकर्ता भी जुटे।
